Dushmani Shayari -दुश्मनी शायरी

 Dushmani Shayari -दुश्मनी शायरी 

ताल्लुक है ना अब तर्क ए ताल्लुक
 खुदा जाने ये कैसी दुश्मनी है




वफा पर दगा सुलह में दुश्मनी है
 भलाई का हरगिज़ जमाना नहीं है



उम्र भर मिलने नहीं देती है अब तो रजिशे 
 वक्त हम से रूठ जाने की अदा तक ले गया



दुश्मनी लाख सही खत्म न कीजे रिश्ता दिल 
मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए 
निदा फ़ाज़ली


करे हैं अदावत भी वो इस अदा 
से लगे हैं कि जैसे मोहब्बत करें हैं


ऐसे बिगड़े के फिर जफा भी न की 
दुश्मनी का हक भी अदा न हुआ



जब जान प्यारी थी तब दुश्मन हजार थे 
अब मरने का शौक है तो कातिल नहीं मिलते



देखा तो वो शख्स भी मेरे दुश्मनों में था 
नाम जिसका शामिल मेरी धड़कनों में था


इलाही क्यों नहीं उठती कयामत माजरा क्या है 
हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन बन के बैठे हैं


करें हम दुश्मनी किस से कोई दुश्मन नहीं अपना 
मोहब्बत ने नहीं छोड़ी जगह दिल में अदावत की


बिना मकसद बहुत मुश्किल है जीना 
खुदा आबाद रखना दुश्मनों को मेरे


Dushman Shayari


वो जो बन के दुश्मन मुझे जीतने को निकले थे 
कर लेते अगर मोहब्बत तो मैं खुद ही हार जाता




मेरे रोने से निकलते हैं आंसू जो  खून के 
मेरे दुश्मन तलबगार है उसको भी पीने के



दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम 
तुम भी थक जाओगे हम भी थक जाएंगे


जख्म भर रहे हैं जरा सी चोट खाया हूं
 मेरे दुश्मनों चेहरे पर मुस्कुराहट रखना
 एक मुद्दत बाद ही सही मैं लौट आया हूं



मेरी नाराजगी पर हक मेरे अहबाब का है बस 
भला दुश्मन से भी कोई कभी नाराज होता है



मोहब्बत अदावत वफा बे रुखी 
किराए के घर थे बदलते रहे 
 बशीर बद्र


किसे खबर की वो मोहब्बत थी या रकाबत थी  
बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए



दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 
जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हो 
बशीर बद्र



यह भी इक बात है अदावत की 
रोजा रक्खा  जो हम ने दावत की



अपने बेगाने से अब मुझ को शिकायत न रही 
दुश्मनी कर के मेरे दोस्त ने मारा मुझ को 
अरशद अली खान


मैं मोहब्बत न छुपाऊं तू अदावत न छुपा न 
यही राज में अब है वही राज में है  
कलीम अजीज



निगाह ए नाज की पहली सी बरहमी भी गई मैं 
दोस्ती को ही  रोता रहा था दुश्मनी भी गई
 माइल लखनवी


मुझे जो दोस्ती है उस को दुश्मनी मुझ से न 
इख़्तियार है उस का न मेरा चारा  है   
गंमगीन देहलवी


इन का उठना नहीं है हश्र से 
कम घर की दीवार बाप का साया

Dushman ke liye Shayari 


मुझ को थकने नहीं देता ये जरूरत का 
 पहाड मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते 
मेराज फैजाबादी


Dushmani Shayari 


यूं तो मैं दुश्मन के काफिले से भी सर
 उठा कर गुजर जाता हूं बस खौफ तो 
अपनों की गलियों से गुजरने में
 लगता है कोई धोखा ना दे दे



दिल में मोहब्बत का होना जरूरी है वरना 
याद तो रोज दुश्मन भी किया करते हैं


कमबख्त दिल पर चोट खाने की
 आदत सी पड़ गई है वरना हम
 भला क्यों दुश्मनो से मिलने लगे



अंधेरे अब नहीं डरते उजाले वार करते हैं 
जो दुश्मन भी नहीं करते वह मेरे अपने करते हैं


किसने कहा था कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं 
आजकल खुशियां बांट दो तो दुश्मन बढ़ जाते हैं


अकेले सफर करना पड़ता है इस जहां में कामयाबी के लिए 
काफिला दोस्त दुश्मन अक्सर कामयाबी के बाद ही बनते हैं



तेरी रुसवाई से मुझे एक सबक मिला दुश्मन भी 
इतना नहीं करता जितना तूने दोस्त बनकर किया


हमें गिराने का जो हर पल मौका देखते हैं 
अपने ही हैं दुश्मन यहां अपने ही धोखा देते हैं


कितने झूठे हो गए हम बचपन में अपनों से रोज 
रूठा करते थे आज दुश्मन से भी मुस्कुरा कर मिलते हैं


हम तो दुश्मनी भी दुश्मन की औकात देखकर
 करते हैं बच्चों को छोड़ देते हैं और बड़ों को तोड़ देते हैं


Dushman ke  Shayari



अगर किस्मत आजमा ते आजमा ते थक गए
हो तो कभी खुद को भी आजमाए  नतीजे बेहतर होंगे


वैसे दुश्मनी तो हम कुत्ते से भी नहीं करते
 पर बीच में आ जाए तो शेर को भी नहीं छोड़ते


जिन लोगों के पास दिखाने के लिए टैलेंट नहीं 
होता वह अक्सर अपनी औकात दिखा जाते हैं


कुछ ना उखाड़ सकोगे तुम हम से दुश्मनी करके 
हमें बर्बाद करना चाहते हो तो हमसे मोहब्बत कर लो


कभी खुद को मेरे प्यार में भुला कर देख 
दुश्मनी अच्छी नहीं मुझसे दोस्त बना कर देख


हम दुश्मन को बड़ी शानदार सजा देते हैं
 हाथ नहीं उठाते बस नजरो से गिरा देते हैं


लोग कहते हैं कि इतनी दोस्ती मत करो
 की दोस्त दिल पर सवार हो जाए मैं कहता हूं 
दोस्ती इतनी करो की दुश्मन को भी तुमसे प्यार हो जाए



खाक मजा है जीने में जब तक 
आग ना लगे  दुश्मन के सीने में


उसके दुश्मन बहुत है आदमी अच्छा 
होगा वो मेरी तरह शहर में तनहा होगा



दुश्मन की महफिल में चल रही थी 
मेरे क़त्ल की तैयारी है मैं पहुंचा तो
बोले यार बहुत लंबी उम्र है



जो दिल के करीब थे वो जब से दुश्मन हो 
गये जमाने में हुए चर्चे हम मशहूर हो गये



रफ्तार जिंदगी की कुछ यू बनाये रखिये 
दुश्मनों से भी बात अदब से कीजिए



दुश्मन भी मेरे मुरीद है शायद वक्त बेवक्त मेरा नाम
 लिया करते हैं मेरी गली से गुजरते हैं छुपा के



दोस्ती भी अब लोग अधूरा करते हैं 
दुश्मनी की कमी अब तो दोस्त पूरा करते हैं


जो दिल के हैं सच्चे उनका दुश्मन पूरा जमाना है
 इस रंग बदलती दुनिया का यही सच्चा फसाना 










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