Ahmad Faraz -अहमद फ़राज़ शायरी

 Ahmad Faraz -अहमद फ़राज़ शायरी 


हुजूम ऐसा की राहे नजर नहीं आती नसीब 
ऐसा कि अब तक तो काफिला न हुआ


रात भर हंसते हुए तारों ने उन 
के आरिज़ भी भिगोए होंगे


इक ये भी तो अंदाज ए इलाज़ ए ग़म जाँ है
 ऐ चारा दर्द बढ़ा क्यू नहीं देते


जो ग़ज़ल आज तिरे हिज़्र में लिखी है
 वो कल क्या खबर है अहल ए 
मोहब्बत का तराना बन जाए



फराज तेरे जुनू का ख्याल है वर्ना  ये 
क्या जरूर वो  सूरत सभी को प्यारी लगे


जिस सम्त भी देखूं नजर आता है कि तूम हो
ऐ जान ए  जहाँ ये कोई तुम सा है कि तुम हो



चले थे यार बड़े ज़ोम में हवा की तरह पलट 
के देखा तो बैठे हैं नक्श ए पा की तरह


साकी ये खामोशी भी कुछ गौर-तलब है 
 साकी तेरे मय ख्वार बड़ी देर से चुप हैं



मुद्दतें हो गई फराज मगर वो
 जो दीवानगी कि थी है अभी


टूटा तो हूं मगर अभी बिखरा नहीं फ़राज़  
मेरे बदन पे जैसे शिकस्तो  का जाल हो



जो गैर थे वो इसी बात पर हमारे हुए 
कि हम  से दोस्त  बहुत बे खबर हमारे हुए


मय कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिज़ाब 
बज़्म ए  साकी में अदब आदाब  मत देखा करो



जुज़ तिरे कोई भी दिन रात न जाने 
मेरे तू कहां है मगर ऐ दोस्त पुराने मेरे


जी मैं जो आती है कर गुजरो कहीं ऐसा ना हो 
कल पशेमाँ हो कि क्यू दिल का कहा माना नहीं


क्या कहें कितने मरासिम  थे हमारे उस से
 वो जो इक शख्स है मुंह फेर के जाने वाला


पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो 
रस्म ओ रह ए  दुनिया ही निभाने के लिए आ


तआ'ना ए नश्श न दो सब को कि कुछ सोख्ता
 जा  शिद्दत ए तिश्र लबी से भी बहक जाते है




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