AHMAD FARAZ BIOGRAPHY

AHMAD FARAZ BIOGRAPHY


AHMAD FARAZ BIOGRAPHY
                                                              



अहमद फ़राज़ : शायरी की दुनिया की एक ख्वाबपस्त आवाज़ 
 जब बात उर्दू गजल की परंपरा की हो रही होती है तो हमें मीर तकी मीर,गालिब, मोमिन, दाग, हसरत,  फानी, जिगर, असगर और नासिर कासमी आदि की चर्चा जरूर करनी होती है मगर बीसवीं शताब्दी में ग़ज़ल की चर्चा हो और विशेष रूप से 1947 के बाद उर्दू गजल का जिक्र हो तो उसके गेसू सवारने वालों में जो नाम लिए जाएंगे उनमें  अहमद फ़राज़ का नाम कई पहलुओं से महत्वपूर्ण है

अहमद फ़राज़ गजल के ऐसे शायर है जिन्होंने ग़ज़ल को आम लोगों में लोकप्रिय बनाने का काबिले तारीफ काम किया ग़ज़ल  यो तो  अपने कई सौ सालों के इतिहास में अधिकतर लोगो  में रुचि का माध्यम बनी रही है मगर अहमद फ़राज़ तक आते-आते उर्दू ग़ज़ल ने  बहुत से उतार-चढ़ाव देखे और जब  फ़राज़ अपने कलाम के साथ सामने आए तो लोगों की उनसे उम्मीदें बढ़ी | खुशी है कि  फ़राज़ ने मायूस नहीं किया अपनी विशेष शैली और शताब्दावली के सांचे में ढाल कर जो  ग़ज़ल उन्होंने पेश  की जनता की धड़कन बन गई और जमाने का हाल बताने के लिए आईना बन गई |  मुशायरे  में अपने कलाम  के माध्यम से अहमद फराज ने कम समय में ख्याति अर्जित कर ली जो बहुत कम शायरों को नसीब होती है बल्कि अगर मैं यह कहूं तो गलत ना होगा की इक़बाल  के बाद पूरी बीसवीं शताब्दी में केवल फैज़  और फिराक का नाम ही आता है जिन्हें शोहरत की बुलंदियां नसीब नहीं रही बाकी कोई शायर अहमद फ़राज़ जैसी शोहरत  हासिल  करने में कामयाब नहीं हो पाया उनकी शायरी जितनी खूबसूरत है उनके व्यक्तित्व का रखरखाव उससे कम खूबसूरत नहीं रहा  
           अहमद फ़राज़ का जन्म पाकिस्तान के सरहदी इलाके में हुआ उनके वालिद एक मामूली शिक्षक थे वह अहमद फ़राज़ को प्यार तो बहुत करते थे लेकिन यह मुमकिन नहीं था कि वे उनकी हर जिद पूरी कर पाते बचपन का वाकया है कि एक बार अहमद फ़राज़ के पिता कुछ कपड़े लाए कपड़े अहमद फ़राज़ को पसंद नहीं आए उन्होंने बहुत उन्होंने खूब शोर मचाया कि हम कंबल के बने कपड़े नहीं पहनेंगे बात यहां तक बढ़ी  कि फ़राज़  घर छोड़कर फरार हो गए वह फरारी तबीयत में ज़ज़्ब  हो गई|  आज तक अहमद फराज फरारी जी रहे हैं कभी लंदन कभी नहीं न्युयोर्क  कभी रियाद तो कभी मुंबई और हैदराबाद| 

अहमद अहमद फ़राज़ की शायरी पर मशहूर शायर कुंवर महेंद्र सिंह बेदी 'की टिप्पणी यहां देना मुनासिब मानता हूं वह  टिप्पणी फ़राज़ को समझने में मददगार हो सकती है:
"फ़राज़ की शायरी ग़मे  दौरा और ग़मे  जाना का एक हसीन संगम है उनके गजले उस तमाम  पीड़ा के प्रतीक है जिससे एक हफ्ता (सोचने वाला ) और रोमांटिक शायर को जूझना पड़ता है उनकी नज़्मे  ग़मे दौरा  की भरपूर तर्जुमानी करती हैं और उनकी कही हुई  बात , जो सुनता है उसी की दास्तां मालूम होती है"
 बेदी  साहब के कहे मुताबिक गौर करें तो फ़राज़के यहाँ महबूबा और जमाने के ग़म एक साथ उभरते हैं बल्कि कहीं-कहीं तो वह अपने निजी ग़म को भी सार्वजनिक बना देते हैं यही उनका कमाल है उदाहरण के तौर पर गौर करें 
कुछ इस तरह से गुजरी जिंदगी के जैसे 
तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा
 किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंजिल
 कोई हमारा तरह उम्र भर सफर में रहा 

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